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देश में पहला केस: चंबा में कैस्पियन कोबरा के डसने से दो की मौत, फेल साबित हुआ एंटी वेनम!

चंबा में कैस्पियन कोबरा के दंश से दो मौतों की पहली वैज्ञानिक रिपोर्ट
शोध में चार मामले दर्ज, दो पीड़ितों की जान बचने का भी उल्लेख
सामान्य एंटी स्नेक वेनम की प्रभावशीलता पर उठे वैज्ञानिक सवाल


चंबा। हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में पाए जाने वाले बेहद जहरीले कैस्पियन कोबरा (नाजा ऑक्सियाना) के दंश से हुई दो मौतों की पहली वैज्ञानिक रिपोर्ट सामने आई है। एपिडेमियोलॉजी इंटरनेशनल के हालिया अंक में प्रकाशित शोध में चंबा जिले में कैस्पियन कोबरा के दंश से दो लोगों की मौत और दो अन्य पीड़ितों के बचने के मामलों का विवरण दर्ज किया गया है। शोध के लेखक हिमाचल प्रदेश स्वास्थ्य सेवाओं के उपनिदेशक एवं राज्य महामारी विज्ञानी डॉ. ओमेश कुमार भारती हैं। अध्ययन में खास तौर पर इस बात को सामने रखा गया है कि भारत में अब तक कैस्पियन कोबरा के दंश से मौत की रिपोर्ट उपलब्ध नहीं थी, जबकि चंबा में इस प्रजाति की मौजूदगी की आनुवंशिक पुष्टि वर्ष 2019 में हो चुकी थी।

चंबा की ऊंची पहाड़ियों में पाया जाता है कैस्पियन कोबरा

शोध के मुताबिक कैस्पियन कोबरा मुख्य रूप से चंबा जिले की पीर पंजाल पर्वतमाला के करीब 2000 मीटर और उससे अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाया जाता है। स्थानीय स्तर पर इस सांप को ‘खड़पा’ नाम से भी जाना जाता है।

चंबा के पहाड़ी और ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों का सामना इस सांप से होने की घटनाएं सामने आती रही हैं। हालांकि इसके दंश से हुई मौतों का वैज्ञानिक दस्तावेज अब सामने आया है। वर्ष 2019 में चंबा में कैस्पियन कोबरा की मौजूदगी की आनुवंशिक पुष्टि होने के बाद इस प्रजाति को लेकर वैज्ञानिक और स्वास्थ्य क्षेत्र में रुचि बढ़ी है।

नई रिपोर्ट में दर्ज मामलों से इस बात पर भी ध्यान गया है कि कैस्पियन कोबरा के दंश की स्थिति में समय पर और प्रभावी चिकित्सा उपचार कितना महत्वपूर्ण हो सकता है।

दो मामलों में गई जान

शोध में कैस्पियन कोबरा के दंश से हुई दो मौतों का विस्तृत उल्लेख किया गया है। पहला मामला भरमौर क्षेत्र के उल्लांसा गांव का है। यहां 40 वर्षीय एक व्यक्ति 6 जुलाई 2020 को सेब के बगीचे में दवा का छिड़काव कर रहा था। इसी दौरान उसका पैर सांप पर पड़ गया और सांप ने उसे दो बार डंस लिया

दंश के बाद उसकी तबीयत बिगड़ने लगी और उसे सांस लेने में परेशानी होने लगी। रिपोर्ट के अनुसार वह शुरुआत में स्थानीय धार्मिक उपचारकर्ता के पास गया। हालत गंभीर होने के बाद उसे अस्पताल ले जाया गया, लेकिन तब तक उसकी मौत हो चुकी थी।

इस मामले में घटना और अस्पताल पहुंचने के बीच उपचार में हुई देरी को भी महत्वपूर्ण पहलू माना जा सकता है। हालांकि रिपोर्ट में मौत के मामले को कैस्पियन कोबरा के दंश से जोड़ा गया है।

दूसरे मामले में आधे घंटे में बेहोश हुआ व्यक्ति

दूसरा मामला चुराह घाटी के भांजरारू गांव का है। 7 जुलाई 2021 को 62 वर्षीय एक व्यक्ति काम पर जाते समय गलती से कैस्पियन कोबरा पर पैर रख बैठा। सांप ने उसके बाएं पैर में दंश किया।

रिपोर्ट के मुताबिक दंश लगने के करीब आधे घंटे के भीतर ही वह बेहोश होकर गिर पड़ा। उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। पोस्टमार्टम के दौरान भी शरीर पर सांप के दंश के निशान पाए गए।

दोनों मामलों में मौत की परिस्थितियां अलग-अलग रहीं। एक व्यक्ति की हालत तेजी से बिगड़ी, जबकि दूसरे मामले में भी दंश के बाद बहुत कम समय में गंभीर स्थिति सामने आई।

सामान्य एंटी स्नेक वेनम की प्रभावशीलता पर सवाल

शोध में एक महत्वपूर्ण चिंता एंटी स्नेक वेनम (ASV) की प्रभावशीलता को लेकर भी सामने आई है। भारत में सामान्य तौर पर उपलब्ध एंटी स्नेक वेनम देश के चार प्रमुख जहरीले सांपों नाग, रसेल वाइपर, करैत और फुरसे के विष को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है।

अध्ययन में उद्धृत वैज्ञानिक शोधों के अनुसार उपलब्ध सामान्य एंटी स्नेक वेनम कैस्पियन कोबरा के विष को प्रभावी ढंग से निष्क्रिय करने में सक्षम नहीं हो सकता। इसके विष में मौजूद कुछ प्रमुख जहरीले घटकों के खिलाफ मौजूदा एंटीवेनम की प्रतिक्रिया कमजोर पाई गई है।

यह जानकारी चंबा जैसे उन क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है जहां कैस्पियन कोबरा की मौजूदगी की पुष्टि हो चुकी है। ऐसे में सांप के दंश के मामलों में केवल सामान्य एंटीवेनम की उपलब्धता ही पर्याप्त उपचार की गारंटी नहीं मानी जा सकती।

विष का हृदय पर पड़ सकता है तीव्र असर

अध्ययन में कैस्पियन कोबरा के विष के हृदय पर तीव्र प्रभाव पड़ने की संभावना का भी उल्लेख किया गया है। शोध में शामिल दो मौतों में एक व्यक्ति की हालत तेजी से बिगड़ गई, जबकि दूसरे व्यक्ति की मौत दंश लगने के करीब 72 घंटे के भीतर हुई।

इससे यह संकेत मिलता है कि कैस्पियन कोबरा के विष के प्रभाव को लेकर चिकित्सकीय स्तर पर विशेष सतर्कता की आवश्यकता है। सांप के दंश के बाद मरीज को तत्काल अस्पताल पहुंचाना और उसकी स्थिति की लगातार निगरानी करना बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है।

हालांकि किसी भी सांप के दंश की स्थिति में घरेलू या पारंपरिक उपचार पर निर्भर रहने के बजाय तत्काल चिकित्सकीय सहायता लेना जरूरी है। सांप के प्रकार की पहचान को लेकर अनिश्चितता होने पर भी उपचार में देरी जोखिम बढ़ा सकती है।

दो लोग बचे, स्थानीय जड़ी-बूटी का भी उल्लेख

रिपोर्ट में कैस्पियन कोबरा के दंश से बचने वाले दो लोगों के मामलों का भी उल्लेख किया गया है। दोनों मामलों में पीड़ितों को सांप पकड़ते समय हाथ पर दंश लगा था।

इनमें से एक घटना 2001 और दूसरी 2006 की बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार उस समय अस्पताल में एंटी स्नेक वेनम उपलब्ध नहीं था। ऐसे में दोनों मामलों में स्थानीय जड़ी-बूटी से तैयार लेप और सेवन का इस्तेमाल किया गया था।

इस जड़ी-बूटी की पहचान मिर्चाड़ी (Pergularia daemia) के रूप में की गई है। हालांकि शोधकर्ता इस बात को स्पष्ट करते हैं कि इस जड़ी-बूटी के सांप के विष पर वास्तविक प्रभाव को लेकर अभी और वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है।

इसका मतलब यह नहीं है कि मिर्चाड़ी या किसी अन्य घरेलू उपचार को सांप के दंश का प्रमाणित उपचार माना जाए। रिपोर्ट में भी इसके प्रभाव की वैज्ञानिक पुष्टि के लिए आगे अध्ययन की जरूरत बताई गई है।

चंबा में सर्पदंश को लेकर बढ़ी वैज्ञानिक चिंता

कैस्पियन कोबरा की चंबा में मौजूदगी और अब इससे जुड़ी मौतों की वैज्ञानिक रिपोर्ट सामने आने से हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों में सर्पदंश प्रबंधन को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा हुआ है। खासकर उन क्षेत्रों में जहां यह सांप अधिक ऊंचाई पर पाया जाता है, वहां स्वास्थ्य व्यवस्था को स्थानीय स्तर पर मौजूद जहरीले सांपों की प्रजातियों और उनके विष के प्रभाव के बारे में जानकारी होना महत्वपूर्ण है।

इस अध्ययन ने यह भी रेखांकित किया है कि किसी क्षेत्र में पाए जाने वाले सांपों की प्रजाति के अनुसार एंटीवेनम की प्रभावशीलता और उपचार व्यवस्था पर लगातार वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है।

चंबा में कैस्पियन कोबरा की आनुवंशिक मौजूदगी की पुष्टि वर्ष 2019 में हो चुकी थी। अब दो मौतों और दो बचाव के मामलों का वैज्ञानिक दस्तावेज सामने आने से इस प्रजाति के दंश को लेकर उपलब्ध जानकारी का दायरा बढ़ा है।

रिपोर्ट से क्या संदेश निकलता है

कैस्पियन कोबरा से जुड़े इन चार मामलों में दो लोगों की मौत और दो के बचने की जानकारी सामने आई है। रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कैस्पियन कोबरा के दंश से भारत में मौतों का वैज्ञानिक दस्तावेज अब सामने आया है।

साथ ही यह अध्ययन स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने यह सवाल भी रखता है कि स्थानीय स्तर पर पाए जाने वाले विषैले सांपों के लिए उपलब्ध एंटीवेनम कितना प्रभावी है और गंभीर सर्पदंश के मामलों में उपचार की व्यवस्था किस तरह बेहतर की जा सकती है।

चंबा जैसे पहाड़ी जिलों में जहां लोग खेती, बागवानी और जंगल से जुड़े कामों के दौरान सांपों के संपर्क में आ सकते हैं, वहां सर्पदंश के प्रति जागरूकता, तत्काल अस्पताल पहुंचना और वैज्ञानिक उपचार बेहद महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट में पारंपरिक जड़ी-बूटी से बचने के दो मामलों का उल्लेख जरूर है, लेकिन शोधकर्ता खुद इसके प्रभाव को लेकर आगे वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता बता रहे हैं। इसलिए इन मामलों को प्रमाणित उपचार के विकल्प के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।